Thursday, August 14, 2008

आजादी का अनमोल अहसास

८/८/०८ की तारीख को लेकर काफ़ी पहले से चर्चा चल रही थी, कोई इस तारीख को अशुभ बता रहा था तो कोई शुभ। अब तारीख निकल चुकी है। और लोगों के लिए यह कैसी रही, मैं नहीं जानती मगर हमारे लिए बहुत ही ख़ास उसआप सोच रहे होंगे की मैं हमारे क्यूँ कह रही हूँ, तो मैं बता दूँ-की ये मेरा और मेरी काफ़ी करीबी दोस्त का साझा अनुभव है।

सुबह ७ बजे घर से निकलते समय मुझे काफ़ी बुरा लग रहा था क्यूंकि आमतौर पर मेरी सुबह ९ बजे के बाद ही होती है। मगर मजबूरी में इंसान क्या नहीं करता, सो मुझे भी आए दिन अपनी सुबह की अच्छी नींद गवानी ही पड़ जाती है। चलिए उस दिन भी जल्दी से तैयार होकर एम्स पहुँची। जिस काम के लिए गई थी वह एक घंटे में ही निबट गया फ़िर ख़बरों की तलाश में कुछ लोगों से भी मिल आई। सब कुछ निबट गया पर अब एक बार घर से निकल चुकी थी इसलिए घर वापस जाने का तो सवाल ही नहीं उठता था, क्यूंकि मुझे दो बजे एक सीनियर डॉक्टर से मिलने के लिए राम मनोहर लोहिया हॉस्पिटल जन था इसलिए अपनी दोस्त को फोन किया, पता लगा की इत्तिफाक से वह भी एम्स में ही थीं, क्यूंकि उनकी दादी वहां भरती थीं। मैं उनके पास चली गई। उन्होंने कहा ही स्वतंत्रता दिवस की रिपोर्टिंग के लिए उन्हें पहचान पत्र बनवाना है और उसका अप्लिकेशन अभी तक नहीं दिया है। तो फैसला ये हुआ की हम लोग पहले प्रेजिडेंट हाउस जाएँगे फ़िर वहीं से वह मुझे राम मनोहर लोहिया छोड़ देंगी।

थोडी देर में हम लोग हॉस्पिटल से निकले। उस दिन हलकी बारिश तो पहले से ही हो रही थी, हमारे निकलते ही काफ़ी तेज हो गई और प्रेजिडेंट हाउस तक पहुँचते पहुँचते पानी ही पानी नजर आने लगा। बारिश का नजारा देख कर भीगने का मन करने लगा लेकिन सोचा की नहीं, भीग कर किसी से मिलने जाना अच्छा बहिन लगेगा। लेकिन प्रेजिडेंट हाउस में अप्लिकेशन देने पहुंचे तो पता लगा की एक बज गया है इसलिए दो बजे के बाद ही काम हो पाएगा। अब एक घंटे तक इन्तेजार करना था और बारिश हो रही थी इसलिए गाड़ी में बैठे रहना भी हजम नहीं हो रहा था, फ़िर हम दोनों ने वहीँ बारिश में भीगने का फ़ैसला किया। बहार निकले और पूरे कैम्पस में घूमने लगे। घुमते-घुमते हम उस गेट के पास पहुँच गए जहाँ से मैं हाल के लिए प्रवेश किया जाता है। वहीँ एक दीवार पर बैठकर हम बातें करते रहे, अपने ख्वाबों को पंख लगाकर उडाते रहे।

हर तरफ़ सिक्यूरिटी वाले तैनात थे इसलिए मुझे थोड़ा डर भी लग रहा था की कोई कुछ बोलने न आ जाए, मगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। उन लोगों ने दूर से हमारे ऊपर नजर राखी थी मगर किसी ने कुछ कहा नहीं। प्रेजिडेंट हाउस कैम्पस में बैठकर भीगने का मजा हमारे लिए अनमोल था और इससे भी खास था अपने आप को आजाद महसूस करने का एहसास। क्यूंकि मुझे नहीं लगता की दुनिया के किसी भी देश में आम इंसान को इतने करीब से अपने देश की ऐसी धरोहर को देखने और उसे महसूस करने का मौका मिलता हो। हलाँकि स्वतंत्रता दिवस करीब होने की वजह से कुछ लोग सिक्यूरिटी पर सवाल भी उठा सकते हैं, वह भी सही है, मगर हमारे लिए आजादी का एहसास इससे कहीं ज्यादा अहम् था................

वरना तो आज कल हर पल की चिंता कभी आजादी का एहसास ही नहीं होने देती ...........

Saturday, August 9, 2008

दर्द का ब्रेकिंग न्यूज़ या ब्रेकिंग न्यूज़ का दर्द

आज कल ये दोनों ही बातें काफ़ी कामन हो गई हैं। मगर इस कामन हो चुके सच ने काफ़ी लोगों को परेशान कर दिया है। परेशानी के दायरे में सिर्फ़ आम ही नहीं खास लोग भी शामिल हैं, लेकिन दिक्कत ये है की इससे निजात मिलने की उम्मीद दूर- दूर तक नजर नहीं आ रही है। आम लोगों को ये समझ नहीं आ रहा है की आख़िर चल क्या रहा है । जब तक अमिताभ बच्चन को खांसी आने और ऐश्वर्या राय को जुकाम होने की बात ब्रेकिंग न्यूज़ होती थी तब तक तो ये सोच कर चुप रह जाते थे की बड़े स्टार की बातें हैं, उनके बहुत चाहने वाले हैं जिन्हें उनकी सलामती की बातें बताना जरूरी है, पर अब लोग ये समझ पाने में अपने आप को नाकाम पा रहे हैं की ये सुप्रतिम नाम का कौन सा नया स्टार आ गया है?
ब्रेकिंग न्यूज़
सुप्रतिम को अस्पताल से छुट्टी मिली
ब्रेकिंग न्यूज़
सुप्रतिम के पिता ने कहा-बेटे पर भरोसा
ब्रेकिंग न्यूज़
डॉक्टर ने कहा सुप्रतिम पूरी तरह से स्वस्थ
ब्रेकिंग न्यूज़
सुप्रतिम ने कहा भगवान् पर भरोसा.......
ब्रेकिंग न्यूज़ का ये नया रूप देखकर न जाने कितने लोगों को बुखार आ गया, पर कर भी क्या सकते थे सिवाय चैनल चेंज करने के............
खास बात तो ये है की अपनी चोट के दर्द से परेशान ख़ुद सुप्रतिम और उनकी हालत से घबराए उनके परिजन भी इस बात को नहीं समझ पा रहे थे की आख़िर उन्हें इतनी अहमियत क्यूँ दी जा रही है? कहीं इसके पीछे कोई राज तो नहीं है? लेकिन उन्हें क्या पता की आजकल दर्द ब्रेकिंग न्यूज़ है, शर्त सिर्फ़ ये है की वो दर्द किसी बड़े शहर के बड़े व्यक्ति या बड़े शहर की बड़ी कम्पनी के एम्प्लाई का होना चाहिए। किसी गाँव के गरीब किसान का नहीं, जो सूखे, अकाल और कर्ज के दर्द से परेशान है........ब्रेकिंग न्यूज़ के निर्माता निर्देशक इस बात को भी जान बूझकर नजर अंदाज कर देना पसंद करते हैं की इसी देश में हर साल एक लाख से भी ज्यादा किसान दर्द के अंत के लिए जीवन का अंत कर देते हैं।
खैर वो भी करें तो क्या करें 'टी आर पी' के दर्द से परेशान जो हैं................

Tuesday, August 5, 2008

बदलते मायने.........

समय ने न सिर्फ़ हर चीज के मायने बदल दिए हेँ बल्कि रिश्तों को देखने का नजरिया भी बदल दिया है खास तौर से दिल्ली जैसे शहरों में रहने वालों के। यहाँ वालों के लिए तो यह बदलाव सामान्य बात है, मगर छोटे शहरों या कस्बाई कल्चर से आने वाले लोगों के लिए यह बदलाव या तो एक मजाक लग सकता है अथवा उनके पैरों नीचे से जमीं खिसकाने वाला हो सकता है।
पिछले दिनों मेरी एक दोस्त का जन्मदिन था, उसने काफ़ी पहले से प्लानिंग कर रखी थी की ऑफिस से छुट्टी लेकर हम पूरा दिन मस्ती करेंगे, एक मूवी देखेंगे और हो सका तो सेंट्रल पार्क भी जायेंगे। उसकी तमन्ना थी इसलिए मैंने भी इनकार नही किया। जैसा की हर आम दिल्ली वाले के साथ होता है की जिस चीज को देखने के लिए लोग देश के कोने कोने से यहाँ आ jate हैं, उस चीज को देखने के लिए यहाँ रहने वालों के पास टाइम नहीं होता है । इसी तरह से हम भी पहले कभी सेंट्रल पार्क नहीं गए थे । मगर जब से पार्क बन कर taiyar हुआ उसके बारे सुना, पढ़ा बहुत था इसलिए सुबह जब घर से निकलने लगे तो साथ में camera भी रख लिया। सेंट्रल पार्क जाकर ऐसा कुछ नहीं दिखा जिसके बारे में हमने सोचा था फ़िर भी साथ में camera था तो उसका istemal तो करना ही था। शायद यह पहला मौका था की हम बिना वजह बैठकर ये सब कर रहे थे इसलिए अपने आप पर हँसी तो aani ही थी । मगर बाद में देखा तो मेरी दोस्त के ये फोटो इतनी अच्छी लगी की उसने orkut
पे load कर दी। कुछ लोगों ने तो फोटो देख के बहुत अच्छा बताया मगर कुछ ने कहा की यार जल्दी से फोटो hataओ। वजह pucha तो बताया की तुम दोनों एक साथ इतने खुश हो, इतनी intimacy नजर आ रही है इसलिए अजीब लग रहा हैलोग तुम्हे abnormel समझ लेंगे। चलो बात aai गई हो gai।
पिछले दिनों हम friendship डे पर kahin jane का प्लान कर रहे थे तो बीच में एक दोस्त बोल पड़ी, यार तुम लोग कितने अजीब हो, मैं तो तुम्हारे साथ नहीं आ रही, मैं अभी इतनी भी modern नहीं hun, ये सुनकर सभी एक दुसरे की तरफ़ देखने लग गए। उसके bolne का matlab तो सबकी समझ आ रहा था मगर इस बात का फ़ैसला कोई नहीं कर पाया की वो कम modern है ki और log ? इसलिए कुछ कहने से बेहतर प्लान cancil करना ही लगा। friendship डे के दुसरे दिन मेरा एक class mate मुझसे मिलने आया। बातों बातों में उसने बताया की मैंने friendship डे पे बहुत enjoy किया । मैंने कहा, क्या क्या किया? तो बताया- long drive पे गया था udaypur तक। मैंने खुश हो के कहा - ऑफिस friends के साथ गए hoge? इतना बोलना था की वह कहता- आर yu crazy? With my girl friend यार। उसकी बातें sunne के बाद मेरे सामने पहले वाली दोनों बातों का matlab समझ आ गया। और ये भी की समय के साथ सब कुछ बदल जाता है लोगों की सोच, रिश्तों के मायने और किसी चीज को देखने का nazariya भी। जो नहीं badalta उसे और लोग या तो abnormal समझ लेते हैं या जरुरत से jyada modern..................